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Leaving the post of assistant professor and introduced mushroom farming

Leaving the post of assistant professor and introduced mushroom farming

असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी छोड़ बन गई मशरूम क्वीन, अब है लाखों का बिजनेस

आज हम आपसे ऐसी महिला का परिचय कराते हैं जो असिस्टेंट प्रोफेसर के पद को छोड़कर महिलाओं के उत्थान में लगी हैं. अनु कंवर राजस्थान के भीलवाडा जिले के एक छोटे से गांव अमल्दा की रहने वाली है. ये पिछले पिछले चार वर्षों से मशरूम उत्पादन (Mushroom Production) के अलावा आचार (Pickle), पापड़, नमकीन का बिजनेस भी कर रही हैं. अब इन्होंने अपना खुद का अमलदा ऑर्गेनिक्स (Aamalda Organics) ब्रांड भी बना लिया है.

जयपुर यूनिवर्सिटी में थी असिस्टेंट प्रोफेसर (Assistant Professor of Jaipur University)

अनु कंवर जी तीन साल तक जयपुर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर (Assistant Professor) के पद पर रही. अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ उन्होने अपना खुद का बिजनेस शुरू करने का सोचा. आपको बता दें कि क्योंकि अनु कंवर छात्रों (Students) को मशरूम (Mushroom) के बारे में पढ़ाया करती थी, और केम्पस में ही एक मशरूम का छोटा सा यूनिट भी बनाया था. इसके बाद अनु जी को ख्याल आया कि क्यों न मैं इस मशरूम उत्पादन को शुरू करूं और गांव की महिलाओं का जीवन स्तर बेहतर बनाने में मदद करूं. क्योंकि गांवों में महिलाओं को ज्यादा विकल्प नहीं मिलते, इसलिए ही अनु कंवर अपनी नौकरी छोड़ गांव चली आई.

ओयस्टर मशरूम को क्यों चुना (Why choose Oyster mushroom)

ओयस्टर मशरूम (Oyster mushroom) की सालभर खेती कर सकते हैं. इस मशरूम में प्रोटीन अच्छी मात्रा में होता है, और कई तरह के औषधीय तत्व भी पाए जाते हैं. ढींगरी (ओयस्टर) मशरूम भी दूसरी अन्य मशरूम की तरह पौष्टिक भोज्य पदार्थ है. ढींगरी मशरूम का व्यवसाय एक फायदेमंद बिजनेस है. इसमें लागत बहुत कम लगती है. उत्पादन कक्ष भी कच्चे और कम लागत पर बनाए जा सकते हैं. एक किलो ढींगरी मशरूम पर 10-15 रुपए लागत आती है और बाजार में मांग के अनुसार 200-250 रूपए प्रति किलो ढींगरी मशरूम बेची जा सकती है. इतना ही नहीं, इसको सुखाकर भी बेचा जा सकता है.

मशरूम की इतनी ज्यादा मांग का क्या है कारण? (Reason for high demand in Mushroom)

राजस्थान के लोगों में पोषक तत्वों (Nutrients value) कमी और इसके अधिक मांग (डिमांड) की वजह से मशरूम का स्कोप अधिक है. इसका उत्पादन कम पूंजी में भी शुरू किया जा सकता है तथा इसके उत्पादन से अधिक मुनाफा (Profit) मिलता है. भोजन में पोषण आवश्यकता को पूरा करने के लिए और आर्थिक स्थितियों (Economic conditions) में सुधार करने के लिए यह विकल्प सबसे अच्छा है.

कोविड महामारी भी इनके हौसलों को नहीं डिगा पाई (Even the Covid-19 pandemic did not stopped their spirits.)

कोरोना महामारी के चलते बिक्री में बहुत ज्यादा असर पड़ा, लेकिन अनु कंवर ने हौसला नहीं हारा. वो बताती हैं कि लॉकडाउन के समय कारोबार (Business) एकदम रूक सा गया था लेकिन धेर्य का परिचय देकर अनु जी ने खुद का अमलदा ओर्गेनिक्स (Aamalda Organics) ब्रांड बनाया. अब आप खुद का मशरूम उत्पादन करने के साथ ही गांव और आसपास की महिलाओं को रोजगारी भी दे रही हैं. इतना ही नहीं, यहां उत्पादित मशरूम का पाउडर (Mushroom powder) बनाया जा रहा है, इसके साथ ही मशरूम आचार, पापड़, नमकीन और मुंगेड़ी पर भी काम शुरू किया हो चुका है.

मूल्य संवर्धन पर दिया अधिक ज़ोर (More importance on value addition)

अनु कंवर जी का मानना है सह उत्पाद (Byproduct) को बेच कर अधिक लाभ लिया जा सकता है. यदि ओएस्टर मशरूम को सीधे न बेच कर उसकी वेल्यू एडिशन की जाए तो अधिक मुनाफा मिल जा सकता है. उत्पादन कार्य 500 से 1000 रुपए से भी शुरू किया जा सकता है. अपने ब्रांड नाम के तहत उपज की बिक्री होती है और महिलाओं के बीच लाभ साझा (Shared) जाता है. इससे इलाकी की महिलों को आय सृजन का स्रोत (Source of Income) मिला है.

आगे का विजन (Forward vision)

अब आप महिलाओं का एक ग्रुप बनाकर काम कर रही है तथा 1000 महिलाओं को इससे जोड़कर किसान उत्पादन संगठन (FPO) बनाने वाली हैं. इन महिलाओं को मशरूम उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा और इनका उत्पाद खरीद कर बेचा जाएगा. अब ये सेंजन (मोरिंगा) से पाउडर बानाने पर भी विचार कर रही हैं. अनु कंवर जी कहती हैं कि हम राजस्थान सरकार के साथ भी काम करना चाहती हैं. इतना ही नहीं, वे महिलाओं की आमदनी, सामाजिक और आर्थिक स्तर को बेहतर बनाने के लिए कोई प्रोजेक्ट तैयार करना चाहती हैं.

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