Left the job in the capital of the country today is not himself the fate replaced with the village farming

सुधीर कुमार
सुधीर कुमार
सुधीर कुमार

देश की राजधानी में नौकरी छोड़ी, आज खुद ही नहीं बल्कि पहाड़ पर बसे गाँव की खेती से बदली किस्मत

यह कहानी उस कामयाब शख्स की है जिसने दिल्ली जैसे बड़े शहर में नौकरी छोड़कर अपने गाँव जाना स्वीकार किया। कहानी तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब अधिकतर संख्या में लोग गाँव से शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। ऐसे में उत्तराखंड के सुधीर कुमार सुंद्रियाल जो राज्य के पौड़ी जिले के चौबट्टाखाल तहसील के निवासी हैं, उन्होंने खेती कर अजब मिसाल पेश की है। वह देश की राजधानी दिल्ली में नौकरी कर रहे थे लेकिन अचानक 2014 में वह अपने गाँव वापस लौट आए।

कहानी में सबसे अहम तथ्य यह है कि अपनी कोई भी संतान न होने पर उन्होंने 21 बच्चों को गोद लिया है। जिनके लालन-पालन के लिए उन्होंने दिल्ली में अपना कीमती ठिकाना तक बेच दिया। आज वह इन बच्चों की अच्छी तरह से देखभाल कर रहे हैं।

खेती करने के फैसले पर अडिग सुधीर ने पंतनगर कृषि एवं प्रोद्दोगिकी विश्वविद्दालय से तकनीकी जानकारियां हासिल की ताकि पर्वतीय क्षेत्र में खेती के बारे में उन्हें महारथ हासिल हो सके। इसके बाद उन्होंने गढ़वाल विश्वविद्दालय से औषधीय पौधों की खेती के बारे में सीखा। और फिर सुधीर ने फीलगुड नामक एक पंजीकृत संस्था के जरिए लोगों के अंदर खेती, पर्यावरण संरक्षण, रोजगार के लिए जागरुकता, बंजर खेतों की आबादी आदि के लिए एक अलख जगाने का काम किया। इसके बाद वह मुहिम की शुरुआत कर गाँव की खुशहाली के लिए कार्य करना शुरु कर दिया। उनके द्वारा गाँव की खुशहाली के लिए शुरु किए गए इस कार्य में उनकी पत्नी ने भी उनका साथ दिया। हैरान कर देने वाली बात है कि शहर में पली बढ़ी उनकी पत्नी पशुओं के लिए चारा हेतु घास काटना एवं गाय का दूध निकालना जैसे कार्य करती हैं।

आज क्षेत्र में बागवानी खेती को बढ़ावा देने के लिए कम से कम दस क्षेत्रों में वह कार्य कर रहे हैं। जिसके लिए पूरी टीम गठित की गई है। रविवार को टीम किसानों के साथ सीधी बातचीत के माध्यम से कृषि तकनीकों की जानकारियां देती है।

उनके द फीलगुड नामक ट्रस्ट जैसे सराहनीय प्रयास को देखते हुए उत्तरांचल एसोसिएशन ऑफ अमेरिका ( ऊना) व सेव द इंडियन फार्मर्स जैसी संस्थाओं द्वारा सहायता भी मिल रही है।

Left the job in the capital of the country today is not himself the fate replaced with the village farming

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