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lilium’s flower earns three lakhs in three months

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उत्तराखंड के चंपावत जिले से हॉलैंड के फूल ने तीन महीने में दी तीन लाख की आमदनी

आज यदि भारत की सबसे बड़ी समस्या की बात की जाए तो वह है रोज़गार. रोज़गार की कमी की वजह से देश का युवा एक शहर से दूसरे शहर भटक रहा है, लेकिन उसे संतोषजनक काम नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में एक खबर उत्तराखंड के चंपावत जिले से आई है. यहां राजीव कुमार नाम के एक व्यक्ति ने सिर्फ एक फूल की खेती कर तीन महीने में तीन लाख कमा लिए हैं. राजीव युवाओं के लिए आज एक मिसाल बन गए हैं. कौन सा है फूल इस फूल का नाम ‘लिलियम है’. यह फूल हॉलैंड में पाया जाता है. राजीव कुमार इसका बीज लेने हॉलैंड तक गए और चंपावत में इसकी खेती करने लगे. ‘लिलियम’ फूल का बीज जितना मंहगा है, इसका फूल उससे अधिक मंहगा. ‘लिलियम’ के फूल देश और विदेश में बहुत अधिक मात्रा में बिकते है. राजीव ने पॉली हाउस लगाकर इस फूल की एक फसल को बेच दिया है, जिससे उन्हें लाखों का मुनाफा हुआ. राजीव को देखकर आस-पास के युवा और किसान प्रेरित हुए और उन्होनें भी फूल की खेती करना आरंभ कर दिया है.

तीन महीने में हुआ तीन लाख का मुनाफा

लिलियम की खेती के बारे में बताते हुए राजीव ने कहा कि हॉलैंड से एसियेटिक का एक बीज 12 रुपए जबकि ओरिएंटल का बीज 22 रुपए का मिला. पॉलीहाउस में तकरीबन 40 हज़ार बीज लगाए गए. एसियेटिक की स्टीक दो महीने और ओरिएंटल की स्टिक तीन महीने में तैयार हो गई. इसे तैयार करने में 10 से 12 लाख खर्चा आया और इस तरह इसे बेचने पर तीन महीने में तीन लाख की आमदनी हो गई.

दिल्ली में भी बिकी स्टिक

राजीव कुमार के अनुसार उनकी स्टिक्स दिल्ली के गाजीपुर फूल मंडी मे धड़ल्ले से बिक गई. लिलियम की स्टिक का बाजार में बहुत उम्दा भाव मिला. यह काफी मंहगी बिकी. ऐसियेटिक की एक स्टिक 20 से 25 रुपए बिकी जबकि ओरिएंटल की एक स्टिक 50 से 60 रुपए में बिक गई. पहली कटिंग करने के बाद इसे थोक में बेचा गया. यहां से यह स्टिक विदेशों में सप्लाई की जा रही है. इसके अलावा जयपुर, हरियाणा और मुंबई समेत यह पुष्प भारी मात्रा में बेचा जाता है.

कुछ अलग करें किसान

राजीव कुमार का कहना है कि उन्होंने पारंपरिक खेती के बजाय कॉमर्शियल खेती करने की सोची और उन्हें उसका परिणाम भी मिला. राजीव का मानना है कि किसान वर्तमान में पारंपरिक खेती के बजाय यदि कॉमर्शियल खेती करे तो उन्हें मुनाफा होगा ही. इसके लिए किसान को न तो किसी सहकारी संस्था की मदद चाहिए और न सरकारों की. वह स्वंय अपना मालिक होगा.

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