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तुलसी

सफल किसान : विदेश छोड़ खेती को बनाया आजीविका का साधन, हो रहा लाखों में कमाई

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में कृषि पृष्ठभूमि से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने के लिए निरन्तर प्रयासरत है जिसके लिए जहां एक ओर कृषि वैज्ञानिक अनुसंधान कार्या में लगे हैं वहीं दूसरी तरफ कृषि प्रसार एजेंसियां किसानों को नवीनतम कृषि तकनीकी को अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. मौजूदा वक्त में बहुत सारे किसान ऐसे हैं जो वैज्ञानिक तरीके से खेती करके अन्य किसानों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनकर उभरे हैं. उन्हीं सफल किसानों में से एक सफल युवा किसान संजय कुमार भी हैं जो कि हिमाचल प्रदेश के जिला मण्डी के सुन्दरनगर विकासखण्ड पलोहटा गांव के रहने वाले हैं, जिन्होंने विदेश छोड़ने के बाद खेती को आजीविका का साधन बनाया है और एकीकृत कृषि को अपनाकर अपनी एक अलग पहचान स्थापित की है.

एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल बना स्वरोजगार का विकल्प

संजय कुमार की आयु 43 वर्ष है तथा उन्होंने स्नातकोक्तर तक शिक्षा प्राप्त की है. उन्हें लगभग 10 वर्ष का कृषि का अनुभव है और उनके पास 12 बीघा खेती योग्य भूमि है. वर्ष 2010 से 2014 तक लगभग 5 वर्ष विदेश अफगानिस्तान व दुबुई में गुजारने के बाद वह अपने गांव वापस आए और कृषि को स्वरोजगार के तौर पर अपनाने के बारे में सोचा. ऐसे में उनके एक मित्र वर्ष 2014 में उन्हें कृषि विज्ञान केन्द्र, सुन्दरनगर में लेकर आए जहां पर वह वैज्ञानिकों से मिले तथा खेती को स्वरोजगार के तौर पर अपनाने की इच्छा प्रकट की. केन्द्र के वैज्ञानिकों ने उन्हें एकीकृत कृषि अपनाने के लिए प्रेरित किया. इसके लिए उन्होंने कृषि विज्ञान केन्द्र में अलग-अलग विषयों में कई प्रशिक्षण प्राप्त किए और अपने फार्म पर एकीकृत कृषि प्रणाली मॉडल स्थापित किया जिससे वह आज बेहतर आमदनी अर्जित कर रहे हैं.

एकीकृत कृषि प्रणाली में अपनाए गए विभिन्न उद्यम

पॉलीहाउस में सब्जी उत्पादन

वर्ष 2016 में उन्होंने चैधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय में संरक्षित खेती पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण प्राप्त किया. वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में उन्होंने कृषि विभाग की वित्तीय सहायता से वर्ष 2017 में 504 वर्गमीटर पॉलीहाउस का निर्माण किया जिसमें वह विभिन्न बेमौसमी सब्जियां जैसे शिमला मिर्च, टमाटर, चैरी टमाटर, खीरा, धनिया, बीन की खेती करते हैं. पॉलीहाउस में सब्जी उत्पादन से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख रूपये की आमदनी होती है. इसके अतिरिक्त उन्होंने गांव में अन्य किसान के असफल हो चुके पॉलीहाउस को अपनाया है जिसमें वह स्वयं सब्जी उत्पादन का कार्य कर रहे हैं जो उनके लिए एक अतिरिक्त आमदनी का साधन बना है. इस पॉलीहाउस में सब्जी उत्पादन कर वह लगभग 3 लाख रूपये की अतिरिक्त आमदनी अर्जित कर रहे हैं.

सिंचाई के लिए टैंक का निर्माण

उन्होंने अपने फार्म पर सिंचाई के लिए एक 50 घनमीटर टैंक का निर्माण भी किया है जिसमें वह वर्षा जल का एकत्रीकरण करके फसलों में सिंचाई के लिए प्रयोग करते हैं.

फसल उत्पादन से आय

अपने फार्म के एक हिस्से 7 बीघे में वह गेहूं, धान, मक्का, दलहन, तिलहन व मौसमी सब्जियों की खेती करते हैं जिससे सालाना उन्हें लगभग 120000 रूपये की आमदनी होती है. फसलों के अवशेषों का प्रयोग पशुओं को चारे के लिए किया जाता है.

खुम्ब उत्पादन का कार्य

संजय कुमार की पत्नी ने भी भारतीय कृषि कौशल परिषद के अंतर्गत मशरूम उत्पादक विषय पर 25 दिवसीय प्रशिक्षण भी सफलतापूर्वक उत्तीर्ण किया है तथा उन्होंने इसी सीजन से अपनी पत्नी के सहयोग से इस उद्यम को अपने एकीकृत कृषि मॉडल में शामिल किया है. अभी बटन मशरूम के 30 बैग रखे हुए हैं जिससे उन्हें अभी तक लगभग 4000 रूपये की आमदनी हुई है साथ ही उत्पादन भी अभी जारी है तथा इस व्यवसाय को भी बड़े पैमाने पर करने की योजना है.

पशुपालन व भेड़ पालन से आमदनी

किसान संजय कुमार से पास 1 देसी व 1 जर्सी नस्ल की गाय तथा 20 बकरियां हैं. इस उद्यम से उन्हें लगभग सालाना लगभग 100000 रूपये की आमदनी प्राप्त होती है. गाय व भेड़ों के गोबर व गौमूत्र का प्रयोग खेती में किया जाता है.

शून्य लागत प्राकृतिक खेती

संजय कुमार ने वर्ष 2019 में कृषि विज्ञान केन्द्र सुन्दरनगर में भारतीय कृषि कौशल परिषद के अंतर्गत ऑर्गेनिक ग्रोवर विषय पर 25 दिवसीय प्रशिक्षण भी सफलतापूर्वक उत्तीर्ण किया है. साथ आत्मा मण्डी हिमाचल प्रदेश के सौजन्य से शून्य लागत प्राकृतिक खेती पर कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर में 2018 में सात दिवसीय प्रशिक्षण भी ग्रहण किया है. आज वह अपनी जमीन के 2 बीघा भाग पर शून्य लागत प्राकृतिक खेती कर रहे हैं. जिसमें वह अपनी देसी नस्ल की गाय से उत्पन्न गोबर व गौमूत्र का प्रयोग जीवामृत, घनाजीवामृत व अन्य सामग्री बनाने में इस्तेमाल कर रहे हैं. संजय कुमार के अनुसार शून्य लागत प्राकृतिक खेती को अपनाने से उत्पादन लागत में कमी आई है तथा बाजार में उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य प्राप्त हो रहा है.

बागवानी

खेतों की बीड़ों व अन्य अनुउपयोगी भूमि पर कई प्रकार के फलदार पौधे जैसे. सेब, नींबू, अनार, आम, कीवी लगाए हैं जिसका उपयोग व अपनी घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए करते हैं.

उत्पाद की मार्केटिंग पर विशेष ध्यान

संजय कुमार मार्केटिंग पर विशेष ध्यान देते हैं. कई बार वह स्वयं ही बी बी एम बी सुन्दरनगर बाजार में अपनी ताजी सब्जियां लेकर जाते हैं जहां पर उनकी सब्जियां हाथों-हाथ ही बिक जाती हैं. इसके अतिरिक्त उन्होंने सब्जियों की मार्केटिंग के लिए जिला मुख्यालय मण्डी में आढ़ती से सम्पर्क बनाकर रखा है, जहां पर वह अपनी सब्जियों को बढ़िया ग्रेडिंग व पैकिंग करके भेजते हैं और उन्हें बेहतर मूल्य प्राप्त होता है.

सोशल मीडिया का प्रयोग

संजय कुमार अन्य नवप्रवर्तक किसानों में से एक हैं जो अपने फार्म के प्रचार- प्रसार के कार्य के लिए सोशल मिडिया वाटसएप, फेस बुक आदि का प्रयोग बेहतर तरीके से करते हैं. उनके अनुसार सोशल मिडिया के प्रयोग से उनकी एडवरटाईजमैंट स्वयं हो जाती है तथा कई व्यापारी उनसे सम्पर्क करते रहते हैं. संजय से उनके अनुभव को जानने के लिए उनके मोबाईल नम्बर 9817646200 पर बात कर सकते हैं.

मास्टर ट्रेनर का कार्य

संजय कुमार शून्य लागत प्राकृतिक खेती में मास्टर ट्रेनर का कार्य कर रहे हैं. राज्य व जिले के कृषि विभाग, बागवानी विभाग व अन्य एजैंसिंयों के प्रशिक्षुओं को उनके अनुभव का लाभ प्रदान करने के लिए उनके फार्म पर भ्रमण करवाया जाता है. इसके अतिरिक्त कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कृषि महाविद्यालय के छात्रों को भी विलेज एटैचमैंट प्रोग्राम के अंतर्गत उनके साथ एटैच किया जाता है.

संजय कुमार क्षेत्र में अन्य युवाओं व किसानों के लिए एक प्रेरणा का स्त्रोत बनकर उभरे हैं. उन्होंने सिमित संसाधनों का कुशल व प्रभावी प्रयोग कर एकीकृत कृषि प्रणाली द्वारा बेहतर आमदनी सुनिश्चित की है और साथ ही सीमान्त व छोटे किसानों के लिए आजीविका सुरक्षा का एक उदाहरण पेश किया है.

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